पुष्प : लैंगिक जनन का स्थल
- परिभाषा:
पुष्प आवृतबीजी (फूलदार) पौधों की जनन संरचना है, जहाँ लैंगिक जनन होता है। - महत्त्व:
- नर एवं मादा युग्मक उत्पन्न करता है।
- परागण एवं निषेचन की क्रिया को संभव बनाता है।
- निषेचन के बाद फल एवं बीज में परिवर्तन होता है।
- उत्पत्ति:
पुष्प, पुष्प अक्ष नामक विशेषीकृत तने पर स्थित पुष्प कली से विकसित होता है।
पुष्प की संरचना
- सममिति (Symmetry):
- अधिशल्य (Actinomorphic) – त्रिज्या पर आधारित सममिति (जैसे – सरसों)।
- द्विशल्य (Zygomorphic) – द्विपार्श्वीय सममिति (जैसे – मटर)।
- लैंगिक वितरण:
- द्विलिंगी (Bisexual) – एक ही पुष्प में पुंकेसर एवं अंडप दोनों उपस्थित (जैसे – गुड़हल)।
- एकलिंगी (Unisexual) – केवल पुंकेसर अथवा अंडप उपस्थित (जैसे – पपीता)।
- फूल के भागों की व्यवस्था:
- पुष्प भाग अधिपत्र (थैलमस) पर वृत्ताकार मंडलों (Whorls) में व्यवस्थित होते हैं।
- मुख्य मंडल:
- पुष्पदल (Calyx) – बाहरी मंडल, दलपुंज।
- पंखुड़ी (Corolla) – पंखुड़ियों का मंडल।
- अण्डपुंज (Androecium) – पुंकेसरों का मंडल, नर जनन अंग।
- गर्भपुंज (Gynoecium) – अंडपों का मंडल, मादा जनन अंग।
सामान्य पुष्प के अंग
- पुष्प डंडी (Pedicel) – पुष्प को सहारा देने वाला डंठल।
- अधिपत्र / पुष्पासन (Thalamus/Receptacle) – पुष्प डंडी का शीर्ष भाग, जिस पर सभी पुष्प मंडल स्थित होते हैं।
- दलपुंज (Calyx/Sepals) –
- सामान्यतः हरे रंग के पत्तेनुमा।
- कली को विकास के प्रारंभिक चरण में सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- पंखुड़ियाँ (Corolla/Petals) –
- सामान्यतः रंगीन एवं आकर्षक।
- कीटों एवं अन्य परागणकर्ताओं को आकर्षित करने हेतु।
- अण्डपुंज (Androecium) –
- पुंकेसर (Stamen) – परागकोष (Anther) तथा डंठल (Filament) से मिलकर बना होता है।
- परागकोष – द्विखंडी, प्रत्येक खंड में दो परागकोषिकाएँ होती हैं जिनमें परागकण पाए जाते हैं।
- गर्भपुंज (Gynoecium) –
- एक या अधिक अंडप (Carpels) से निर्मित।
- अंडप के भाग:
- वर्तिकाग्र (Stigma) – पराग ग्रहण करता है।
- वर्तिका (Style) – वर्तिकाग्र को अंडाशय से जोड़ता है।
- अंडाशय (Ovary) – इसमें बीजाणुक (Ovules) होते हैं।
पुष्प के कार्य
- जनन: नर एवं मादा युग्मक उत्पन्न करता है।
- परागण: परागकण स्थानांतरित करने के लिए संरचना एवं आकर्षण प्रदान करता है।
- निषेचन: युग्मकों के मेल से युग्मज (Zygote) का निर्माण।
- फल एवं बीज निर्माण: निषेचन के बाद अंडाशय फल में तथा बीजाणु बीज में परिवर्तित होते हैं।
- आनुवंशिक विविधता: पर-परागण से संतानों में विविधता उत्पन्न होती है।
पुंकेसर (सूक्ष्मबीजपत्र)
- परिभाषा: फूल का नर प्रजनन अंग, जिसे सूक्ष्मबीजपत्र (Microsporophyll) भी कहा जाता है।
- संरचना:
- फिलामेंट (डंठल): पतला डंठल जो परागकोष (Anther) को सहारा देता है।
- परागकोष: सामान्यतः द्विखण्डीय (Bilobed); प्रत्येक खण्ड में दो सूक्ष्मपरागकोष (Microsporangia) होते हैं।
- कनेक्टिव: परागकोष के दोनों खण्डों को जोड़ने वाला ऊतक।
- कार्य: सूक्ष्मबीजाणुओं (परागकणों) का निर्माण सूक्ष्मबीजाणुजनन (Microsporogenesis) द्वारा करता है।
परागकोष (सूक्ष्मपरागकोष) का विकास
- एक अधपके परागकोष में चार सूक्ष्मपरागकोष होते हैं – प्रत्येक खण्ड में दो।
- सूक्ष्मपरागकोष की भित्ति की परतें (बाहर से भीतर की ओर):
- एपिडर्मिस (Epidermis): बाहरी सुरक्षात्मक परत।
- एंडोथीसियम (Endothecium): परागकोष के फटने में सहायक।
- मध्य परतें (Middle Layers): 1–3 पतली कोशिकाएँ, जो पकने पर नष्ट हो जाती हैं।
- टैपेटम (Tapetum): सबसे भीतरी पोषक परत, जो परागकणों को पोषण व एंजाइम प्रदान करती है।
- परागकोष के भीतर सूक्ष्मबीजाणु जनक कोशिकाएँ (MMC) होती हैं, जो मीओसिस द्वारा सूक्ष्मबीजाणु बनाती हैं।
सूक्ष्मबीजाणुजनन (Microsporogenesis)
- परिभाषा: सूक्ष्मबीजाणु जनक कोशिकाओं (MMC) से मीओसिस द्वारा सूक्ष्मबीजाणुओं का निर्माण।
- प्रक्रिया:
- प्रत्येक MMC मीओसिस द्वारा चार हैप्लॉइड सूक्ष्मबीजाणुओं का एक चतुष्क (Tetrad) बनाती है।
- प्रारम्भ में जुड़े रहते हैं, बाद में अलग होकर परागकण में विकसित होते हैं।
- महत्व: मीओसिस द्वारा आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है।
परागकोष का फटना (Dehiscence of Anther)
- परागकण पकने पर परागकोष सूख जाता है और एंडोथीसियम की कोशिकाएँ सिकुड़ जाती हैं।
- इससे तनाव उत्पन्न होता है और परागकोष की दीवार में अनुदैर्ध्य दरार बन जाती है।
- परागकण बाहर निकलकर परागण के लिए तैयार हो जाते हैं।
सूक्ष्मबीजाणु और परागकण
- सूक्ष्मबीजाणु: मीओसिस के बाद बना नवयुवक हैप्लॉइड कोशिका, जो परागकण में विकसित होती है।
- परागकण की संरचना:
- एक्साइन (Exine): बाहरी परत; स्पोरोपोलिनिन से बनी, रासायनिक रूप से अत्यंत स्थायी।
- इन्टाइन (Intine): भीतरी परत; सेल्युलोज व पेक्टिन से बनी।
- अपरचर (Germ Pore): एक्साइन में पतले क्षेत्र जहाँ से परागनली (Pollen Tube) निकलती है।
परागकण के बिखरने के बाद का भविष्य
- जीविता अवधि (Viability): प्रजाति के अनुसार परागकण की सक्रियता कुछ मिनटों से लेकर कई महीनों तक रह सकती है।
- उदाहरण:
- धान, गेहूँ – लगभग 30 मिनट।
- कुछ दलहनी पौधे – कई महीने।
- उदाहरण:
- प्रभावकारी कारक: तापमान, आर्द्रता, भंडारण की स्थिति।
- अनुकूल वंध्याग्र (Stigma) पर पहुँचने पर अंकुरित होता है, अन्यथा नष्ट हो जाता है।
नर युग्मकधारी का विकास
- परागकण का अंकुरण:
- परागकण अनुकूल वंध्याग्र पर गिरकर पानी अवशोषित करता है।
- परागनली अंकुरित होकर वंध्याग्र से अंडाशय की ओर बढ़ती है।
- कोशिका विभाजन:
- परागकोष में: सूक्ष्मबीजाणु मिथोसिस द्वारा दो कोशिकाओं में विभाजित होता है:
- जनन कोशिका (Generative Cell): छोटी; बाद में दो नर युग्मक बनाती है।
- नलिका कोशिका (Vegetative / Tube Cell): बड़ी; परागनली की वृद्धि को नियंत्रित करती है।
- परागकण के उत्सर्जन समय पर यह दो-कोशिकीय (अधिकतर पौधे) या तीन-कोशिकीय (कुछ पौधे जैसे लिली) हो सकता है।
- परागकोष में: सूक्ष्मबीजाणु मिथोसिस द्वारा दो कोशिकाओं में विभाजित होता है:
- अंतिम संरचना: नलिका कोशिका + 2 नर युग्मक परागनली के भीतर।
स्त्रीकेसर (मेगास्पोरॉफिल) एवं बीजांड (मेगास्पोरैंजियम)
- स्त्रीकेसर (Carpel): पुष्प का स्त्री प्रजनन अंग, जिसे मेगास्पोरॉफिल भी कहते हैं।
- स्त्रीकेसर के भाग:
- वर्तिकाग्र (Stigma): परागकण ग्रहण करता है।
- वर्तिका (Style): वर्तिकाग्र को अंडाशय से जोड़ने वाला पतला डंठल।
- अंडाशय (Ovary): आधार पर स्थित फूला हुआ भाग, जिसमें एक या अधिक बीजांड होते हैं।
- बीजांड (Ovule / Megasporangium): अंडाशय के अंदर स्थित संरचना, जिसमें मेगास्पोर और स्त्री युग्मकोष का विकास होता है।
बीजांड की संरचना
- डंठिल (Funicle): बीजांड को अंडाशय की भीत (प्लेसेंटा) से जोड़ने वाला डंठल।
- बीजनाल (Hilum): वह स्थान जहाँ डंठिल बीजांड से जुड़ा होता है।
- बीजावरण (Integuments): बीजांड को ढकने वाली सुरक्षात्मक परतें, जो एक छोटा छिद्र (परागद्वार) छोड़ देती हैं।
- परागद्वार (Micropyle): वह छिद्र जिससे परागनलिका निषेचन के समय प्रवेश करती है।
- न्यूसेलस (Nucellus): बीजावरणों से ढकी परेंकाइमा कोशिकाओं का द्रव्य, जो भ्रूणकोष को पोषण देता है।
- भ्रूणकोष (Embryo Sac): न्यूसेलस के अंदर स्थित स्त्री युग्मकोष।
- कलश (Chalaza): परागद्वार के विपरीत छोर पर स्थित आधार भाग, जहाँ बीजावरण आपस में मिलते हैं।
बीजांड के प्रकार (परागद्वार की स्थिति के आधार पर)
- संपुटबीजी (Orthotropous / Atropous): परागद्वार, कलश एवं डंठिल एक सीध में (उदा० – पॉलिगोनम)।
- अनात्रोपस (Anatropous): बीजांड उल्टा होकर परागद्वार डंठिल के समीप आ जाता है; सर्वाधिक सामान्य प्रकार (उदा० – सूरजमुखी, सरसों)।
- कैंपिलोट्रॉपस (Campylotropous): बीजांड मुड़ा हुआ, भ्रूणकोष भी थोड़ा मुड़ा हुआ (उदा० – सेम)।
- एम्फीट्रॉपस (Amphitropous): बीजांड एवं भ्रूणकोष दोनों मुड़े हुए (उदा० – अफ़ीम)।
- सर्किनोट्रॉपस (Circinotropous): विकास के दौरान बीजांड पूर्ण रूप से घूम जाता है (उदा० – ओपुन्टिया)।
मेगास्पोरोजेनेसिस एवं स्त्री युग्मकोष का विकास
- मेगास्पोरोजेनेसिस: न्यूसेलस के अंदर स्थित मेगास्पोर जनक कोशिका (MMC) से मेगास्पोर बनने की प्रक्रिया।
- क्रम:
- एक अधस्त्वक कोशिका MMC (द्विगुणित) में परिवर्तित होती है।
- MMC में मीओसिस होता है → चार एकगुणित मेगास्पोर रेखानुक्रम में बनते हैं।
- अधिकांश आवृतबीजी पौधों में केवल एक मेगास्पोर (कार्यशील) रहता है, शेष तीन नष्ट हो जाते हैं।
- स्त्री युग्मकोष (भ्रूणकोष) का विकास:
- कार्यशील मेगास्पोर तीन मिथोसिस विभाजनों से होकर 8 नाभिकीय, 7-कोशिकीय भ्रूणकोष बनाता है।
मोनोस्पोरिक पॉलिगोनम-प्रकार भ्रूणकोष की संरचना
- कोशिकाएँ/नाभिक संख्या: 7 कोशिकाएँ, 8 नाभिक।
- व्यवस्था:
- परागद्वार छोर (Micropylar End):
- एक अंडाणु कोशिका – नर युग्मक से मिलकर युग्मज बनाती है।
- दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids) – परागनलिका को अंडाणु तक पहुँचाने में सहायक।
- केन्द्रीय कोशिका:
- इसमें दो ध्रुवीय नाभिक होते हैं, जो नर युग्मक से मिलकर त्रिगुणित प्राथमिक एण्डोस्पर्म नाभिक बनाते हैं।
- कलशीय छोर (Chalazal End):
- तीन प्रतिपोडी कोशिकाएँ (Antipodals) – सामान्यतः बाद में नष्ट हो जाती हैं।
- परागद्वार छोर (Micropylar End):
- ध्रुवीयता: परागद्वार छोर (अंडाणु युक्त) एवं कलशीय छोर (प्रतिपोडी युक्त) भ्रूणकोष के विपरीत छोर होते हैं।
परागण (Pollination)
- परिभाषा: पुंकेसर (केसर) के परागकणों का वर्तिकाग्र (स्टिग्मा) तक स्थानांतरण।
- प्रकार:
- स्वपरागण (Autogamy / Geitonogamy)
- परपरागण (Xenogamy / Allogamy)
स्वपरागण (Self-Pollination)
- परिभाषा: परागकणों का एक ही फूल के अंडप पर (स्वपरागण / Autogamy) या उसी पौधे के दूसरे फूल पर (गैटनोगैमी / Geitonogamy) स्थानांतरण।
- स्वपरागण के अनुकूलन (Adaptations):
- उभयलिंगी फूल जिनमें केसर और वर्तिकाग्र पास-पास हों।
- समकालिकता (Homogamy): केसर और वर्तिकाग्र का एक साथ परिपक्व होना।
- क्लाइस्टोगैमी (Cleistogamy): फूल न खुलना, जिससे स्वपरागण सुनिश्चित हो (जैसे – बनफशा, ऑक्सालिस)।
- लाभ:
- परागणकर्ताओं की अनुपस्थिति में भी बीजन सुनिश्चित।
- मातृ-पितृ लक्षण स्थिर रहते हैं (शुद्ध वंश)।
- हानि:
- आनुवंशिक विविधता का अभाव।
- पीढ़ी दर पीढ़ी निकटसंकरण (Inbreeding) से कमजोरी।
परपरागण (Cross-Pollination)
- परिभाषा: एक पौधे के फूल से दूसरे पौधे (उसी प्रजाति के) के फूल पर परागकणों का स्थानांतरण।
- अनुकूलन:
- एकलिंगी फूल (स्वपरागण असंभव)।
- असमकालिकता (Dichogamy): पुंकेसर और अंडप अलग-अलग समय पर परिपक्व।
- स्व-असंगतता (Self-incompatibility): आनुवंशिक कारणों से स्व-निषेचन रुकना।
- हरकोगैमी (Herkogamy): पुंकेसर और वर्तिकाग्र के बीच भौतिक अवरोध।
वायुपरागण (Anemophily)
- उदाहरण: मक्का, गेहूँ, धान।
- अनुकूलन:
- फूल छोटे, आकर्षणहीन, बिना मकरंद।
- बड़ी मात्रा में हल्के व सूखे परागकण।
- लंबे, पंखदार वर्तिकाग्र हवा में पराग पकड़ने हेतु।
- पुंकेसर खुले हुए, हवा में पराग छोड़ने के लिए।
जलपरागण (Hydrophily)
- उदाहरण: वॅलिस्नेरिया, हाइड्रिला, जोस्टेरा।
- अनुकूलन:
- जलवासी पौधों में पाया जाता है।
- परागकण जलरोधी, लंबे या तंतु जैसे।
- वॅलिस्नेरिया में नर फूल पानी की सतह पर तैरते हुए मादा फूल से मिलते हैं।
कीटपरागण (Entomophily)
- उदाहरण: सूर्यमुखी, ऑर्किड, सेज।
- अनुकूलन:
- बड़े, रंगीन, सुगंधित फूल।
- मकरंद व भोज्य पराग उपस्थित।
- चिपचिपे या कांटेदार परागकण जो कीटों पर चिपक जाएँ।
- फूलों का आकार-प्रकार विशेष कीटों के अनुसार।
पक्षीपरागण (Ornithophily)
- उदाहरण: गुड़हल, कोरल ट्री, बॉटलब्रश।
- अनुकूलन:
- बड़े, चमकीले लाल या पीले फूल।
- प्रचुर मकरंद।
- मजबूत पुष्प-रचना जो पक्षियों का भार सह सके।
- कई प्रजातियों में नलिकाकार (ट्यूबुलर) पुष्पमुकुट।
वृकोदरपुष्पण / चमगादड़ परागण (Chiropterophily)
- उदाहरण: बौहिनिया, किगेलिया।
- अनुकूलन:
- बड़े, मटमैले रंग के, रात्रि में खिलने वाले फूल।
- तीव्र फल जैसी या किण्वित गंध।
- प्रचुर मकरंद और पराग।
- मजबूत फूल जो चमगादड़ों का भार सह सकें।
परपरागण के लाभ
- आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है, जिससे पर्यावरणीय अनुकूलन और विकास संभव।
- संतान अधिक सशक्त व रोगप्रतिरोधी हो सकती है।
- निकटसंकरण अवसाद (Inbreeding depression) से बचाव।
- लाभदायक लक्षणों का पुनर्संयोजन।
पराग–स्त्रीकेसर अंतःक्रिया (Pollen–Pistil Interaction)
- परिभाषा: परागकण (नर युग्मकोष) और स्त्रीकेसर (मादा प्रजनन अंग) के बीच होने वाली घटनाओं एवं रासायनिक अंतःक्रियाओं की श्रृंखला, जो संगतता (compatibility) को निर्धारित करती है और सफल निषेचन की ओर ले जाती है।
- महत्व:
- केवल संगत परागकणों के अंकुरण को सुनिश्चित करता है।
- असंगत परागकणों द्वारा व्यर्थ निषेचन को रोकता है।
पराग–स्त्रीकेसर अंतःक्रिया के चरण
- पराग का वर्तिकाग्र (Stigma) पर जमना
- परागकण वायु, जल, कीट, पक्षी या चमगादड़ जैसे परागण कारकों द्वारा वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं।
- पहचान और स्वीकृति/अस्वीकृति
- वर्तिकाग्र की सतह पर विशेष प्रोटीन एवं रासायनिक संकेत होते हैं जो पराग की पहचान करते हैं।
- संगत परागकण स्वीकृत होकर अंकुरित होते हैं।
- असंगत परागकण स्व-असंगतता (self-incompatibility) तंत्र द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते हैं।
- पराग का अंकुरण
- संगत परागकण वर्तिकाग्र से जल एवं पोषक तत्व ग्रहण करके फूल जाते हैं।
- परागनलिका (pollen tube) बहिर्आवरण (exine) के अंकुर रंध्र (germ pore) से बाहर निकलती है।
- परागनलिका का वर्तिका में वृद्धि
- परागनलिका वर्तिका ऊतक के अंदर बढ़ती है, जिसका मार्गदर्शन अंडाशय से आने वाले रासायनिक संकेत करते हैं।
- नलिका कोशिका (tube cell) परागनलिका की वृद्धि को नियंत्रित करती है; जनन कोशिका (generative cell) विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है।
- अंडाशय तक मार्गदर्शन
- बीजांड (ovule) में उपस्थित सहायक कोशिकाएँ (synergids) परागनलिका को रासायनिक आकर्षक पदार्थ स्रावित करके अंडद्वार (micropyle) तक पहुंचाती हैं।
- बीजांड में प्रवेश
- परागनलिका प्रजाति के अनुसार अंडद्वार से (पोरोगैमी), चालाज़ा से (चालाज़ोगैमी) या वर्तिका से (मेसोगैमी) प्रवेश करती है।
स्व-असंगतता के तंत्र
- परिभाषा: पौधे की वह अवस्था जिसमें स्व-परागण के बाद भी बीज नहीं बनते, क्योंकि यह प्रक्रिया आनुवंशिक रूप से नियंत्रित होती है।
- प्रकार:
- गैमीटोफाइटिक स्व-असंगतता – पराग की संगतता परागकण के अपने जननविज्ञान (genotype) पर निर्भर करती है।
- स्पोरोफाइटिक स्व-असंगतता – पराग की संगतता उस मूल पौधे के जननविज्ञान पर निर्भर करती है जिसने परागकण बनाए हैं।
- कार्य: बाह्यपरागण को बढ़ावा देना और आनुवंशिक विविधता बनाए रखना।
सफल पराग–स्त्रीकेसर अंतःक्रिया का परिणाम
- दो नर युग्मक भ्रूणकोष में पहुंचाए जाते हैं:
- एक अंडाणु से मिलकर संयोग (Syngamy) द्वारा युग्मज (zygote) बनाता है।
- दूसरा ध्रुवीय नाभिकों से मिलकर त्रिगुणन (Triple Fusion) द्वारा प्राथमिक भ्रूणपोषी नाभिक (Primary Endosperm Nucleus) बनाता है।
स्व-असंगतता (Self-Incompatibility)
- परिभाषा: यह पुष्पीय पौधों में पाई जाने वाली एक आनुवंशिक प्रक्रिया है, जिसमें स्व-परागण (Self-Pollination) होने पर उसी पौधे के परागकण अंकुरित नहीं होते या उनकी पराग नलिका (Pollen Tube) वर्तिकाग्र (Stigma) या वर्तिका (Style) में बढ़ नहीं पाती।
- उद्देश्य:
- पर-परागण (Cross-Pollination) को प्रोत्साहित करना।
- प्रजाति में आनुवंशिक विविधता बनाए रखना।
स्व-असंगतता के प्रकार
- गैमेटोफाइटिक स्व-असंगतता (Gametophytic Self-Incompatibility – GSI)
- परागकण की संगतता परागकण के अपने आनुवंशिक संघटन (हैप्लॉइड जीनोटाइप) पर निर्भर करती है।
- उदाहरण: निकोटियाना (तम्बाकू), पेटूनिया।
- यदि परागकण का S-ऐलील वर्तिकाग्र के किसी S-ऐलील से मेल खाता है, तो पराग नलिका की वृद्धि वर्तिका में ही रुक जाती है।
- स्पोरोफाइटिक स्व-असंगतता (Sporophytic Self-Incompatibility – SSI)
- परागकण की संगतता उस मूल पौधे के आनुवंशिक संघटन (डिप्लॉइड स्पोरोफाइट) पर निर्भर करती है जिसने पराग उत्पन्न किया है।
- उदाहरण: ब्रैसिका (सरसों कुल)।
- यदि पराग उत्पन्न करने वाले पौधे का S-ऐलील वर्तिकाग्र के S-ऐलील से मेल खाता है, तो परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित नहीं होता।
क्रियाविधि (Mechanism of Action)
- वर्तिकाग्र और परागकण के बीच पहचान S-जीन तंत्र द्वारा होती है।
- असंगत परागकण:
- वर्तिकाग्र पर अंकुरित नहीं होता (Surface Inhibition)।
- या पराग नलिका की वृद्धि वर्तिका के भीतर रुक जाती है।
- संगत परागकण:
- अंकुरित होकर पराग नलिका भ्रूणकोष तक पहुँचती है और निषेचन होता है।
स्व-असंगतता का महत्त्व
- निकट-संबंधी प्रजनन (Inbreeding) और उससे होने वाले ह्रास (Inbreeding Depression) को रोकता है।
- आनुवंशिक पुनर्संयोजन (Genetic Recombination) को बढ़ावा देता है।
- प्रजाति की अनुकूलन क्षमता और विकासशीलता (Evolutionary Potential) बढ़ाता है।
स्व-असंगतता को दूर करने के उपाय
- कली परागण (Bud Pollination): वर्तिकाग्र की ग्रहणशीलता से पहले परागण करना।
- मेंटोर परागण (Mentor Pollen): संगत पराग को विकिरणित (irradiated) असंगत पराग के साथ मिलाना।
- विकास नियामकों का उपयोग: गिबरेलिन या साइटोकाइनिन जैसे हार्मोन का छिड़काव करना।
- इन विट्रो निषेचन: प्रयोगशाला में सीधे पराग नलिका को अंडाशय पर विकसित कराना।
नरपुंकीकरण (Emasculation) और थैलीकरण (Bagging)
नरपुंकीकरण (Emasculation)
- परिभाषा: किसी उभयलिंगी (bisexual) फूल से पुंकेसरों (stamens) को परागकण निकलने से पहले हटाने की क्रिया।
- उद्देश्य:
- स्वपरागण (self-pollination) को रोकना।
- सुनिश्चित करना कि केवल इच्छित नर जनक का परागकण ही प्रयोग हो।
- विधि:
- अधपके कली अवस्था में, जब परागकोष (anther) अपरिपक्व हो, तब चिमटी या कैंची की सहायता से पुंकेसरों को हटाया जाता है।
- इस प्रक्रिया में स्त्रीकेसर (gynoecium) को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखा जाता है।
- कहाँ प्रयोग होता है:
- कृत्रिम संकरण (artificial hybridization) प्रयोगों में।
- पादप प्रजनन (plant breeding) कार्यक्रमों में।
थैलीकरण (Bagging)
- परिभाषा: नरपुंकीकरण किए गए फूल को उपयुक्त थैली (बटर पेपर, पॉलीथीन या कपड़े) से ढकने की क्रिया ताकि अनचाहे परागकण उस पर न पड़ें।
- उद्देश्य:
- वांछित परागण (desired pollination) तक स्तigma को विदेशी परागकणों से बचाना।
- नियंत्रित परागण की स्थिति बनाए रखना।
- प्रक्रिया:
- नरपुंकीकरण के तुरंत बाद फूल को थैली से ढक दिया जाता है।
- जब वर्तिकाग्र (stigma) पराग ग्रहण करने योग्य हो जाए, तो थैली को थोड़ा हटाकर इच्छित परागकण छिड़का जाता है।
- परागण के बाद पुनः फूल को थैली से ढक दिया जाता है, जब तक निषेचन (fertilization) सुनिश्चित न हो जाए।
पादप प्रजनन में महत्व
- संकरण में वंशानुक्रम की शुद्धता बनाए रखना।
- हवा या कीटों द्वारा आकस्मिक परागण को रोकना।
- इच्छित गुणों वाली फसल की किस्में विकसित करने में सहायक।
निषेचन (Fertilization)
- परिभाषा: नर एवं मादा युग्मकों के संलयन से युग्मनज (Zygote) का निर्माण होने की प्रक्रिया।
- आवृतबीजी पौधों में निषेचन अंडाशय के भीतर स्थित बीजांड (Ovule) में होता है, जब पराग नलिका नर युग्मकों को पहुँचाती है।
- इसमें तीन मुख्य अवस्थाएँ होती हैं – पराग नलिका की वृद्धि, पराग नलिका का बीजांड में प्रवेश तथा द्वि-निषेचन।
पराग नलिका की वृद्धि (Growth of the Pollen Tube)
- परागण तथा पराग–स्त्रीकेसर सामंजस्य के बाद:
- परागकण का अंकुरण – वर्तिका (Stigma) से जल एवं पोषण ग्रहण करता है।
- पराग नलिका का निर्माण – परागकण के गर्भछिद्र (Germ pore) से नलिका निकलती है।
- दिशात्मक वृद्धि – रासायनिक आकर्षण (Chemotaxis) के द्वारा वर्तिका एवं वर्तिकाग्र से होकर अंडाशय की ओर बढ़ती है।
- कोशिका विभाजन – परागकण की जनन कोशिका (Generative cell) विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है, जबकि वानस्पतिक कोशिका (Vegetative cell) नलिका की वृद्धि नियंत्रित करती है।
पराग नलिका का बीजांड में प्रवेश (Entry of the Pollen Tube into the Ovule)
- पराग नलिका बीजांड में तीन मार्गों में से किसी एक से प्रवेश करती है:
- सूक्ष्मद्वारगम्यता (Porogamy) – सूक्ष्मद्वार (Micropyle) से प्रवेश (सबसे सामान्य)।
- अस्थिगम्यता (Chalazogamy) – अस्थि (Chalaza) से प्रवेश (दुर्लभ)।
- अंतर्गम्यता (Mesogamy) – बीजावरण (Integuments) से प्रवेश (दुर्लभ)।
- पराग नलिका भ्रूणकोष (Embryo sac) के एक सहायक कोशिका (Synergid) में प्रवेश कर दो नर युग्मकों को छोड़ देती है।
द्वि-निषेचन (Double Fertilization)
- परिभाषा: आवृतबीजियों की विशेष प्रक्रिया जिसमें एक ही भ्रूणकोष में दो प्रकार के निषेचन होते हैं।
- प्रक्रिया:
- संयोग (Syngamy) – एक नर युग्मक, अंडाणु (Egg cell) से मिलकर युग्मनज (2n) बनाता है।
- त्रिगुण संलयन (Triple Fusion) – दूसरा नर युग्मक, केन्द्रीय कोशिका (Central cell) के दो ध्रुवीय नाभिकों से मिलकर प्राथमिक एंडोस्पर्म नाभिक (PEN, 3n) बनाता है।
- महत्व:
- युग्मनज से भ्रूण (Embryo) का विकास।
- प्राथमिक एंडोस्पर्म नाभिक से एंडोस्पर्म का निर्माण, जो भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
- परिणाम: एक ही प्रक्रिया में भ्रूण एवं एंडोस्पर्म दोनों का निर्माण होता है, जिससे प्रजनन अधिक प्रभावी होता है।
निषेचन के बाद होने वाले परिवर्तन
एंडोस्पर्म का विकास
- एंडोस्पर्म भ्रूण के पोषण के लिए बनने वाला विशेष ऊतक है।
- यह ट्रिप्लॉइड (3n) होता है और द्विगुणित निषेचन के दूसरे उत्पाद से बनता है।
- विकास के प्रकार:
- न्यूक्लियर प्रकार – प्रारंभ में कई बार नाभिक विभाजन, कोशिका भित्ति बाद में बनती है।
- सेलुलर प्रकार – प्रत्येक नाभिक विभाजन के बाद कोशिका भित्ति बनती है।
- हेलोबियल प्रकार – पहले विभाजन के बाद एक कोशिका न्यूक्लियर प्रकार और दूसरी सेलुलर प्रकार का विकास करती है।
भ्रूण का विकास (भ्रूणजनन)
- भ्रूण ज़ाइगोट से विकसित होता है।
- द्विबीजपत्री पौधों में भ्रूणजनन के चरण:
- ज़ाइगोट का पहला विभाजन – एपिकल और बेसल कोशिका।
- सस्पेंसर का निर्माण – भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
- भ्रूण अक्ष और बीजपत्र का निर्माण।
बीज का विकास
- निषेचन के बाद बीजांड (ovule) बीज में परिवर्तित हो जाता है।
- बीज की संरचना: बीजावरण, भ्रूण और एंडोस्पर्म।
- बीज प्रकार:
- एंडोस्पर्मिक बीज – जिसमें परिपक्व बीज में एंडोस्पर्म विद्यमान रहता है (गेहूं, मक्का)।
- गैर-एंडोस्पर्मिक बीज – जिसमें एंडोस्पर्म भ्रूण के विकास के दौरान पूर्णतः उपभोग हो जाता है (मटर, सेम)।
फल का विकास
- अंडाशय का परिपक्व होना फल कहलाता है।
- प्रकार:
- साधारण फल – एक फूल के एक अंडाशय से बना (आम, टमाटर)।
- सामूहिक फल – एक फूल के अनेक स्वतंत्र अंडाशयों से बना (कमल, रसभरी)।
- संविलयन फल – पुष्पक्रम के अनेक फूलों के अंडाशयों से बना (अनानास)।
एपॉमिक्सिस और बहुभ्रूणत्व (Apomixis and Polyembryony)
1. एपॉमिक्सिस (Apomixis)
- परिभाषा – बीज का निर्माण बिना युग्मन (fertilization) के।
- यह एक प्रकार का अलैंगिक प्रजनन है जिसमें भ्रूण का निर्माण बिना नर और मादा युग्मकों के संलयन के होता है।
- सामान्यतः यौन प्रजनन में मेयोसिस और निषेचन के बाद बीज बनता है, लेकिन एपॉमिक्सिस में ये चरण अनुपस्थित होते हैं।
प्रकार
- एगामिक एपॉमिक्सिस – भ्रूण, मेगास्पोर या एग सेल के बिना, न्यूसेलस या इंटीग्यूमेंट से विकसित होता है।
- एडवेंटीशियस एम्ब्रियोनी – भ्रूण थैली के बाहर न्यूसेलस या इंटीग्यूमेंट से विकसित होता है।
- डिप्लोस्पोरी – भ्रूण थैली मेयोसिस के बिना डिप्लॉइड मेगास्पोर मदर सेल से बनती है।
- अपोस्पोरी – भ्रूण थैली न्यूसेलस की डिप्लॉइड सोमैटिक कोशिकाओं से बनती है।
महत्व
- पौधों में संकर लक्षण (Hybrid traits) पीढ़ी दर पीढ़ी बनाए रखे जाते हैं।
- उच्च उत्पादक और रोग प्रतिरोधी किस्में स्थायी रहती हैं।
- बीज उत्पादन में समय और लागत की बचत होती है।
2. बहुभ्रूणत्व (Polyembryony)
- परिभाषा – एक ही बीज में एक से अधिक भ्रूणों का निर्माण।
- यह प्राकृतिक या कृत्रिम रूप से हो सकता है।
प्रकार
- सच्चा (True Polyembryony) – सभी भ्रूण युग्मन के बाद ज़ाइगोट से विकसित होते हैं।
- मिश्रित (Mixed Polyembryony) – भ्रूण ज़ाइगोट और अन्य ऊतक (जैसे न्यूसेलस) दोनों से विकसित होते हैं।
- एडवेंटीशियस (Adventive Polyembryony) – भ्रूण केवल न्यूसेलस या इंटीग्यूमेंट से विकसित होते हैं।
उदाहरण
- साइट्रस (Citrus), आम (Mango), गाजर (Carrot) में बहुभ्रूणत्व देखा जाता है।
महत्व
- प्राकृतिक क्लोनिंग का माध्यम।
- उच्च गुणवत्ता वाले पौधों की संख्या बढ़ाना।
- खेती में समान लक्षणों वाले पौधों की उपलब्धता।
