ज्योति भारत: सुमित्रानंदन पंत

कविता

ज्योति भूमि,
जय भारत देश!

ज्योति चरण धर जहाँ सभ्यता
उतरी तेजोन्मेष!

समाधिस्थ सौंदर्य हिमालय,
श्वेत शांति आत्मानुभूति लय,

गंगा यमुना जल ज्योतिर्मय
हँसता जहाँ अशेष!

फूटे जहाँ ज्योति के निर्झर
ज्ञान भक्ति गीता वंशी स्वर,

पूर्ण काम जिस चेतन रज पर
लोटे हँस लोकेश!

रक्तस्नात मूर्छित धरती पर
बरसा अमृत ज्योति स्वर्णिम कर,

दिव्य चेतना का प्लावन भर
दो जग को आदेश!

कविता का अर्थ :

इस कविता का अर्थ है कि भारत एक उज्ज्वल, ज्ञान और चेतना से भरी हुई भूमि है। यह वह स्थान है जहाँ सभ्यता का प्रकाश उतरा और आध्यात्मिक तेज फैला।

हिमालय ध्यान और सौंदर्य का प्रतीक है, जो आत्मज्ञान और शांति का अनुभव कराता है। गंगा और यमुना का जल आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है, जो निरंतर हँसता और प्रवाहित होता है।

यहाँ ज्ञान, भक्ति और गीता के उपदेशों का संगम है, जहाँ भगवान कृष्ण की बांसुरी की ध्वनि गूँजती है। यह वह भूमि है, जहाँ चेतना पूर्ण है और जहाँ स्वयं देवता भी आनंदपूर्वक विचरण करते हैं।

कवि कहते हैं कि इस धरती ने कई बार रक्तस्नान सहा है, लेकिन अंततः अमृत रूपी प्रकाश बरसा है। अब समय आ गया है कि इस दिव्य चेतना से पूरे संसार को एक नया मार्गदर्शन मिले और भारत पूरी दुनिया को नई रोशनी और संदेश दे।

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